-भव छंद- भव मा भार ग्यारा । जग ला लगय प्यारा आखिर दीर्घ भरथे । यगण घला भव रथे जइसे- व्यास कला रूप हे । अपने मा अद्भूत हे वो तीनों काल ला। जानय हर हाल ला अपन दृश्टि खोल के । देखय कुछु बोल के लोग समय फेर मा । करय धरम ढेर मा वेद ज्ञान भुलाये । अपन ज्ञान लमाये मनखे धरय रद्दा । छोड़य काम भद्दा अइसे वो सोच के । बात सबो खांच के वेद मन ल बाँट के । अलग करिस छाँट के
-तोमर छंद- बारह म तोमर छंद । होथे सुजानुक चंद रखले पताका अंत । जस रखे तुलसी संत जइसे- हृदय मा ईश्वर वास । देखेंव आत्म प्रकाश ईश्वर के दिव्य रूप । सकल सृष्टि के सरूप जेखर रंग ना रूप । चराचर के जे भूप बिना आँखी के देख । बिना कान के सरेख अब्बड़ मजा मैं पाँव । मन मा मूरत बसाँव जेने खाय पतिआय । बाकी मनन बतिआय मोर मन गोतो खाय । ईश्वर सरूप बसाय
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