-दीप छंद-


-दीप छंद-
जेन चरणन चार । धरय जब दस भार
नगण गुरू लघु अंत । दीप गढ़ बलवंत

दीप गुरतुर होय । मन मा सुख समोय
‘गढ़‘  के करब गोठ । हमन जुरमिल पोठ

जइसे-
सुन लौ सब सुजान । देके अपन कान
हे भगवत पुराण । जेखर अपन मान
घीव असन लुकाय । कृष्ण रहय समाय
जे लेवय बिलोय । अपन मन ल धोय
पाहि जीवन सार । होहि बंधन पार
भागवत रसपान । हवय अमृत समान
मिलय ज्ञान विराग । मिटय सब अनुराग
सत रज तम सरूप । ब्रम्हा हरि हर भूप
जनम प्रगति विराम । सब मा हवय ष्याम

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

-अहीर छंद-

-नित छंद-

-भव छंद-